गुलज़ार साहब ने लिखा है कि, “चारागर लाख करें कोशिश-ए-दरमाँ लेकिन, दर्द इस पर भी न हो कम तो ग़ज़ल होती है!” इसी दर्द की दवा ढूंढ रहा ‘मुसाफ़िर’ आपसे यहाँ कुछ कहना चाहता है|