Hindi Poetry

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ये ज़रूरी तो नहीं – Hindi Poetry 3.7 (10)

ये ज़रूरी तो नहीं – Hindi Poetry 3.7 (10)

जीवन का मतलब आजकल व्यक्ति के सफल या निष्फल होने से या उसके पाने या खोने से निकालना ये चलन बन गया है| जीवन नपे-तुले मापदंडो में समाविष्ट या व्याख्यायित किया ही नहीं जा सकता ये कैसे समजाए कोई इन्हें? ‘ये ऐसे ही होता है’, ‘वो वैसे ही होना चाहिए’ ऐसी सीमाओं में बंधे वो जीवन कहाँ? उन्मुक्त बहते झरने सा बेबाक, अनिश्चित, प्रबल प्रवाह ही जीवन है| इसीलिए तो, जो हम सोचें वही घटे ये ज़रूरी तो नहीं|

नया साल – Hindi Poem | By Japan Vora 1 (1)

नया साल – Hindi Poem | By Japan Vora 1 (1)

प्रेम का शिखर वो जगह है जहां व्यक्ति स्वयं के अलावा और कुछ लेकर नहीं पहुँच सकता| व्यक्ति का अहंकार जब उसके व्यक्तित्व से प्रतिबिंबित होने लगे, तब वह अपने आसपास प्रसरते अंधकार को अपनाने लगता है| आतंरिक अंधकार ख़ुद से ख़ुद की पहचान नहीं होने देता और व्यक्ति भरे विश्वमें अकेला रहेना स्वीकार कर उसे जीवन बनाने लगता है| प्रस्तुत कविता ऐसे ही एक व्यक्तित्व की ज़ुबानी है की कैसे वह अहंकार के संग जीते हुए हरदिन अपने को एक नए आयाम में देख पाता है|

मैं मुझसे मिलना चाहता हूँ  – Hindi Poem | By Japan Vora 5 (3)

मैं मुझसे मिलना चाहता हूँ – Hindi Poem | By Japan Vora 5 (3)

निदा फ़ाज़ली जी का एक शेर है, “एक से हो गए मौसमों के चेहरे सारे, मेरी आँखों से कहीं  खो गया मंज़र मेरा!” ज़िंदगी के मायने और क्या है ये चाहे पता ना चल पाए तो कोई बात नहीं, खुद से एक मुलाकात और खुद से खुद की पहेचान ज़रूरी है| सच – झूठ, सही – गलत, क्यों, क्या से ऊपर उठकर, मुक्त मन से कुछ लम्हों के लिए ही सही स्वयं से मिलने की इस कविता में प्रस्तुत कामना आप भी रखते है क्या?

कोशिश – Hindi Poetry | By “मुसाफ़िर” Deepak Sharma 3.6 (19)

कोशिश – Hindi Poetry | By “मुसाफ़िर” Deepak Sharma 3.6 (19)

गुलज़ार साहब ने लिखा है कि, “चारागर लाख करें कोशिश-ए-दरमाँ लेकिन, दर्द इस पर भी न हो कम तो ग़ज़ल होती है!” इसी दर्द की दवा ढूंढ रहा ‘मुसाफ़िर’ आपसे यहाँ कुछ कहना चाहता है|

आज नहीं होगा – Hindi Poetry 3 (2)

आज नहीं होगा – Hindi Poetry 3 (2)

आज स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर,अटल बिहारी बाजपाईजी के इन शब्दों के अलावा कोई और शब्द हमारा जज़्बा बयां नहीं कर पाते, “उजियारे में, अंधकार में, कल कहार में, बीच धार में, घोर घृणा में, पूत प्यार में, क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में, जीवन के शत-शत आकर्षक, अरमानों को ढलना होगा| कदम मिलाकर चलना होगा|”

ग़ज़ल – Hindi Poetry 5 (1)

ग़ज़ल – Hindi Poetry 5 (1)

निदा फ़ाज़ली का ये शेर ही हमारी ग़ज़लको मुकम्मिल करता है की, “दिल में न हो जुर्रत तो मुहब्बत नहीं मिलती; ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती|

तू लगती है – Hindi Poetry 3 (4)

तू लगती है – Hindi Poetry 3 (4)

ये लगाए न लगनेवाली और बुझाए न बुझनेवाली चाहकी तपिश शायद ऐसी ही होती है.मजरुह सुल्तानपुरीने इसी पर कहा है की, “अलग बैठे थे फिर भी आँख साक़ी की पड़ी हम पर, अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आएँगे|

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