अपना शहर – Hindi Poetry

4.7
(7)
September 30, 2021
"ये क्या जगह है दोस्तो, ये कौन सा दयार है| हद-ऐ-निगाह तक जहां ग़ुबार ही ग़ुबार है||" - 'शहरयार' जी की ये पंक्तियाँ एक शहरी इंसान की भावनाएं व्यक्त करने के लिए काफ़ी है| सपने दिखाता शहर, ज़िंदगी को समजने, समजाने के बड़े अलग ढंग जानता व आज़माता है| हिसाब का पक्का शहर हमें जो कुछ भी देता है, सूद समेत वापस भी लेता है| यही उसका तरीका है और यही उसका चलन भी!

Written by - Swati Joshi

खिड़की जितना सूरज है और

छज्जे जितनी चांदनी;

चुल्लू जितने दिल है यहाँ और

मुठ्ठी भरके आमदनी,

ये अपना शहर है!

चिड़ियों से पहले यंत्र है जगते,

सारे एक ही दौड़ है भगते;

धुएँ, धूल और धक्कों से

हो शुरू कहानी,

यूँ होती सहर है!

दिल की जगह जेबें रखी है,

‘मतलब’ से यारी पक्की है;

लोलुपता ही लगे शहद सी

नातों की नींव में बेईमानी,

व लालच का ज़हर है!

थोडा और, और थोडा बस,

कुछ और ज़रा के वास्ते;

सांसों की लगाते होड़

जीवनभर छाने रास्ते,

क्यों कुछ नोटों का दाम,

तेरी पूरी ज़िंदगानी?

ये कैसा कहर है?

सफलता का पैमाना यहाँ चीज़ें है,

जुर्रतें लांघती दहलीज़े है;

बेच के नींदें दौलत जो अर्जित होती है

लागत में फिर सपनों की है वही चुकानी,

यही गुज़र-बसर है!

सराब जैसे ख़्वाब हमको तू दिखलाए,

कशिश अजब की बंदे तुझमे ग़ुम हो जाएँ;

चंद सुखों की किंमत यहाँ बस कुछ आंसू है,

तो रीत ये तेरी लगे है इसको बड़ी सुहानी!

जो तेरा बशर है!

बाकि जहां ,

खिड़की जितना सूरज है और

छज्जे जितनी चांदनी;

चुल्लू जितने दिल है वहाँ और

मुठ्ठी भरके आमदनी,

वही अपना शहर है!

*सहर = सवेरा, *लोलुपता = लालच, *अर्जित = कमाई हुई, *पैमाना = नाप, परिमाण, *गुज़र-बसर = निर्वाह, *सराब = मृगतृष्णा, *बशर = इंसान

Love what you read? Click on stars to rate it!

As you found this post useful...

Share this post with more readers.

Best Sellers in Kindle Store

ACI_KindleStore._SS300_SCLZZZZZZZ_

Older Stories

Let’s Start Talking!

Swati Joshi is an Indian writer who loves to write in English and Indian Languages like Gujarati. Read her Gujarati Poetry and Motivational articles at Swati's Journal.
Swati Joshi

www.swatisjournal.com

1 Comment

Submit a Comment