अपना शहर – Hindi Poetry

by | Sep 30, 2021 | Hindi Poetry | 1 comment

अपना शहर – Hindi Poetry

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खिड़की जितना सूरज है और

छज्जे जितनी चांदनी;

चुल्लू जितने दिल है यहाँ और

मुठ्ठी भरके आमदनी,

ये अपना शहर है!

चिड़ियों से पहले यंत्र है जगते,

सारे एक ही दौड़ है भगते;

धुएँ, धूल और धक्कों से

हो शुरू कहानी,

यूँ होती सहर है!

दिल की जगह जेबें रखी है,

‘मतलब’ से यारी पक्की है;

लोलुपता ही लगे शहद सी

नातों की नींव में बेईमानी,

व लालच का ज़हर है!

थोडा और, और थोडा बस,

कुछ और ज़रा के वास्ते;

सांसों की लगाते होड़

जीवनभर छाने रास्ते,

क्यों कुछ नोटों का दाम,

तेरी पूरी ज़िंदगानी?

ये कैसा कहर है?

सफलता का पैमाना यहाँ चीज़ें है,

जुर्रतें लांघती दहलीज़े है;

बेच के नींदें दौलत जो अर्जित होती है

लागत में फिर सपनों की है वही चुकानी,

यही गुज़र-बसर है!

सराब जैसे ख़्वाब हमको तू दिखलाए,

कशिश अजब कि बंदे तुझमे ग़ुम हो जाएँ;

चंद सुखों की किंमत यहाँ बस कुछ आंसू है,

तो रीत ये तेरी लगे है इसको बड़ी सुहानी!

जो तेरा बशर है!

बाकि जहां ,

खिड़की जितना सूरज है और

छज्जे जितनी चांदनी;

चुल्लू जितने दिल है वहाँ और

मुठ्ठी भरके आमदनी,

वही अपना शहर है!

*सहर = सवेरा, *लोलुपता = लालच, *अर्जित = कमाई हुई, *पैमाना = नाप, परिमाण, *गुज़र-बसर = निर्वाह, *सराब = मृगतृष्णा, *बशर = इंसान

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