Written by Swati Joshi

May 10, 2019

क़समों के खुले मैदानों पर,

इक़रार के पौधे बोए थे

बारिश न दिखी जब दूर तलक,

अश्कों में  पत्ते डुबोए थे|

सजदेमें झुके थे हम जिनके,

कभी बन ना सका वो अपना ख़ुदा

काँटों से लदी दरख्तों पे

मैंने आमके ख़्वाब संजोए थे |

तुझको पाना है ग़र नामुमकिन,

ख़ुदसे मिलने का भी दम रखते है

सेहरा की सुलगती रेतों में

कभी हमनें भी पाँव भिगोए थे !




निदा फ़ाज़ली का ये शेर ही हमारी ग़ज़लको मुकम्मिल करता है की, “दिल में न हो जुर्रत तो मुहब्बत नहीं मिलती; ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती|”

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